भारत का इतिहास

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“मेरी पुस्तक तथ्यों का ऐतिहासक अभिलेख है मैं पाठकों के सम्मुख हिन्दुओं के सिद्धांत एकदम ठीक रूप में प्रस्तुत करूंगा और उनके संबंध में यूनानियों के वे सिद्धांत पेश करूँगा जो हिन्दू सिद्धान्तों से मिलते-जुलते हैं ताकि उन दोनों के बीच जो संबंध है वह उजागर हो सके….।”

“अपने विषय का प्रतिपादन करने से पहले हमें इस संबंध में समुचित विचार करना होगा कि वह क्या बात है जो भारत संबंधी किसी भी विषय के मूल तक पहुंचने में विशेष रूप से कठिनाई उपस्थित करती है। इन कठिनाइयों का बोध या तो हमारे कार्य को आगे बढ़ाने में सुविधा प्रदान करेगा या यदि हमारे कार्य में कोई त्रुटि रह जाए तो उसका कारण सिद्ध होगा।”

“पहली कठिनाई तो यह है कि वे हमसे हर उस बात में भिन्न हैं जिसमें हममें और अन्यजातियों में समानता है। पहले भाषा को ही लें…..यदि आप इस कठिनाई का समाधान करना चाहते हैं (यानी संस्कृत सीखना चाहते हैं) तो आपके लिए ऐसा करना आसान नहीं होता क्योंकि शब्द-भंडार तथा विभक्तियों दोनों ही दृष्टि से इसका क्षेत्र बहुत विस्तृत है।”

“यही नहीं, भारतीय लेखक बहुत लापरवाह भी हैं और वे सही तथा सुसंबद्ध विवरण प्रस्तुत करने में परिश्रम नहीं करते….।
दूसरी कठिनाई यह है कि वे धर्म में भी हमसे सर्वथा भिन्न हैं। कोई भी वस्तु जो किसी विदेशी की आग या पानी से छू जाए उसे वे अपवित्र मानते हैं…..।”

“तीसरी बात यह कि वे सभी प्रकार के आचार-व्यवहार में…हमारी वेश-भूषा और हमारे रीति-रिवाजों से अलग हैं….।
कुछ और भी कारण हैं…(यथा) उनके जातिगत चरित्र की विशेषताएं….।”

“अतः यह है भारत की वस्तुस्थिति। यही कारण है कि अपने विषय में अपार रुचि होने के बावजूद मुझे उसमें पैठने में बड़ी मुश्किल पेश आई…और यह भी तब जबकि मैंने संस्कृति के ग्रंथ एकत्र करने के लिए परिश्रम या धन खर्च करने में कोई कसर नहीं उठा रखी।”

 

यदि लेखन-शैली की ओर ध्यान न दिया जाए, जो कुछ पुरानी है, तो उपर्युक्त पंक्तियों को भारत पर लिखी किसी विदेशी समाजशास्त्री की हाल ही की किसी पुस्तक की भूमिका के उद्धरण समझा जा सकता है। वास्तव में यह एक ऐसी पुस्तक के आरंभिक पृष्ठों से ली गई पंक्तियां हैं जिसका लेखक आज से एक हजार से कुछ अधिक वर्षों पहले जन्मा था। इनके लेखक के लिए यहां की संस्कृति बिल्कुल नई थी लेकिन उसने उस समझने और अपने यहां के लोगों के लिए सहानुभूति पूर्वक प्रस्तुत करने का ऐसी अवधारणा ईमानदारी के साथ प्रयत्न किया कि उसे ‘‘सबसे पहले वैज्ञानिक और किसी भी युग के एक महानतम भारतविद्’’ के नाम से अभिहित किया गया।1 इस पुस्तक का नाम है ‘किताब फ़ी तहफ़ूक़ मा लिल हिन्द मिन मक़ाला मक़्बूला फ़िल अक़्ल-औ-मरजूला’ जिसे आम तौर पर ‘किताब-उल-हिन्द’ कहा जाता है और उसका लेखक था अबू रेहान मुहम्मद इब्न-ए-अहमद जिसे ज़्यादातर लोग अल-बिरूनी के नाम से जानते हैं। एडवर्ड सी. सखाऊ  ‘किताब-उल-हिन्द’ के संपादक और अनुवादक हैं|

अल बिरूनी का जन्म 973 ई. में ख़्वारिज़्म इलाके में हुआ था जिस पर उस समय तूरान और ईरान के सामानी वंश (874-999) का शासन था। ख़्वारिज़्म, आधुनिक ख़ीव जो उन्नीसवीं शताब्दी में मध्य एशिया में तुर्किस्तान का ख़ान राज्य था। यह अब  उज्बेकिस्तान  का एक भाग है।. यद्यपि अल-बिरूनी का जन्म ख़्वारिज्म में हुआ था तथापि उसके माता-पिता ईरानी मूल के थे और उन्हें उस स्थान पर परदेशी माना जाता, इसी कारण से उन्हें फ़ारसी उपनाम बिरूनी (बाहर के) दिया गया।  उसका जन्म नगर में नहीं बल्कि उपमहानगरीय क्षेत्र में हुआ था जिसके कारण उसे अल-बिरूनी की संज्ञा दी गई और आज वह अपने असली नाम के बजाय इसी नाम से जाना जाता है। ‘बिरूनी’ फ़ारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘बाहर का’; प्रस्तुत संदर्भ में इसका अभिप्राय ख़्वारिज़्म नामक नगर का सीमांत प्रदेश है।

अल-बिरूनी के जीवन से संबंधित अरबी के कुछ प्राचीन ग्रंथों में यह उल्लेख मिलता है कि बिरून सिंध के एक शहर का नाम था और चूंकि वह उसी शहर में पैदा हुआ था इसलिए उसका नाम अल-बिरूनी पड़ा। लेकिन यह भ्रांत धारणा है जो शायद इस वजह से पैदा हुई होगी क्योंकि सिंद में निरून नामक एक नगर था और प्रतिलिपिक की गलती से उसे बिरून पढ़ लिया और फिर उसी स्थान को अल-बिरूनी का जन्म स्थान मान लिया गया।1 अल-बिरूनी की भारतीय संस्कृति में प्रखर रुचि को ही शायद उसके भारतीय मूल का परिचायक मान लिया गया।

अल-बिरूनी ईरानी मूल का मुसलमान था। उसके आरंभिक जीवन और लालन-पालन के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है2 लेकिन लगता है उसे अपने बचपन में पढ़ने-लिखने के पर्याप्त अवसर मिले होंगे। स्वाध्याय में उसकी रुचि आजीवन बनी रही। इस संबंध में एक कथा है कि उस समय जबकि वह अपनी अंतिम सांसे ले रहा था और उसका एक मित्र उससे मिलने आया तो अल-बिरूनी ने उससे गणित संबंधी उसके समाधान के बारे में पूछा जिसका हवाला उस मित्र ने पहले कभी उसे दिया होगा। उसका मित्र हैरान हो गया और बोला, ‘ताज्जुब है कि तुम इस अवस्था में भी इन बातों के प्रति चिंतित हो।’’ अल-बिरूनी ने बड़ी मुश्किल से उसकी हैरानी दूर करते हुए कहा, ‘‘क्या मेरे लिए यह वांछनीय न होगा कि मैं निर्मेय का समाधान जाने बिना मर जान के बजाय उसे जान लूं और फिर दम तोड़ूं ? इस पर मित्र ने उसे इच्छित जानकारी दी और वह कमरे से बाहर निकला ही था कि उसने लोगों को अल-बिरूनी की मृत्यु पर विलाप करते सुना।

अल-बिरूनी एक महान भाषाविद् था और उसने अनेक पुस्तकें लिखी थीं। अपनी मातृभाषा ख़्वारिज़्मी के अलावा जो उत्तरी क्षेत्र की एक ईरानी बोली थी और जिस पर तुर्की भाषा का प्रबल प्रभाव था, वह इब्रानी, सीरियाई और संस्कृत का भी ज्ञाता था। यूनानी भाषा का उसे कोई प्रत्यक्ष ज्ञान तो न था लेकिन सारियाई और अरबी अनुवादों के माध्यम से उसने प्लेटो तथा अन्य यूनानी आचार्यों के ग्रंथों का अध्ययन किया था। जहां अब तक अरबी और फ़ारसी का संबंध है इस दोनों भाषाओं का उसे गहन ज्ञान था और उसने अधिकांश पुस्तकें जिनमें ‘किताब-उल-हिन्द’ शामिल है फ़ारसी ही में लिखी थीं क्योंकि वही उस युग की अंतर्राष्ट्रीय भाषा थी। उसी में समस्त सभ्य संसार के वैज्ञानिक ग्रंथ संगृहीत थे और वही विज्ञान तथा साहित्य की विभिन्न शाखाओं में उपलब्ध बहुमूल्य योगदानों का माध्यम थी।

अल-बिरूनी का आरंभिक जीवन एक ऐसे युग में बीता था जिसके दौरान मध्य एशिया में बहुत तेजी के साथ और बड़े प्रचंड राजनीतिक परिवर्तन हुए थे और उनमें से कुछ परिवर्तनों का प्रभाव उसके जीवन और कृतियों पर भी पड़ा था।

इसके पहले ख़्वारिज़्म के स्थानीय राजवंश—मैमूनी—के संरक्षण में ही रहा था जिसने 995 ई. के आसापस सामानियों की पराधीनता का जुआ उतार फेंका था। इसका अल-बिरूनी के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और वह ख़्वारिज़्म छोड़कर चला गया और कुछ समय तक जुरजन में (जो कैस्पियन सागर के दक्षिण-पूर्व क्षेत्र में स्थित था) शम्सुल माइली क़ाबूस बिन वास्मगीर के दरबार में रहा जिसे उसने अपना ‘आसार-उल-बाक़िया’ अन-इल-कुरुन-अल-खालिया1 समर्पित किया था जो उसने सबसे प्राचीन तथा अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में माना जाता है। लगता है कि 1017 में जब सुल्तान महमूद ग़ज़नवी ने (999-1030) ख़्वारिज़्म के राज्य पर आक्रमण करके उसे अपने राज्य में मिला लिया तो अल-बिरूनी ख़्वारिज़्म लौट आया। ख़्वारिज़्म के दरबार के प्रमुख व्यक्तियों में जिन्हें विजेता की राजधानी गजनी ले जाया गया था अल-बिरूनी भी था। उसके बाद वह अधिकतर ग़ज़नी में रहकर जीवकोपार्जन करता रहा और 440 हिं. (1048-1049)2 में 15 वर्ष की आयु में वहीं उसकी मृत्यु हुई।

यह बात स्पष्ट नहीं है कि अल-बिरूनी की सुल्तान महमूद के दरबार में क्या स्थिति थी। शायद वह एक बंधक के रूप में था; लेकिन एक विद्वान के रूप में उसकी उपलब्धियों के कारण और विशेष रूप से एक खगोलशास्त्री तथा ज्योतिषी होने के नाते वह एक सम्मानित बंधक रहा होगा। लेकिन इसके बावजूद सुल्तान महमूद के साथ उसके संबंध बहुत निकट के तथा मैत्रीपूर्ण नहीं रहे। भारत पर उसकी विख्यात ग्रंथ सुल्तान महमूद के राज्यकाल में ही (1030) के आसपास) रचा गया था, किन्तु उसमें सुल्तान का कुछ ही प्रसंगों में उल्लेख मिलता है और वह भी बहुत संक्षेप में। इसके बिलकुल विपरीत महमूद के पुत्र सुल्तान मसूद (1030-1040) के प्रति उसका दृष्टिकोण सौहार्दपूर्ण था जिसे उसने अपनी महानतम कृति ‘अल-क़ानून अल-मसूदी फ़िल हइया-वलनुजूम’ समर्पित की थी और उसकी भूरि भूरि प्रशंसा की थी। अल-बिरूनी के जीवन का अंत भाग जो मसूद के दरबार में बीता था भौतिक समृद्धि और धन-संपत्ति से संपन्न रहा होगा।

ग़ज़नी में उसके प्रवास का यही वह काल है जबसे उसकी भारत में और भारतवासियों के प्रति रुचि प्रारंभ हुई थी। जैसा कि हमें ज्ञात है खगोलविज्ञान, गणित और आयुर्विज्ञान पर भारत में लिखे गए अनेक प्रमुख ग्रन्थों का अरबी में अनुवाद बहुत पहले अब्बासी काल के आरंभ में ही हो चुका था। इसमें से कुछ अल-बिरूनी के पास भी रहे होंगे। यह बात स्वयं ‘किताब-उल-हिन्द’ से स्पष्ट हो जाती है जिसमें अल-बिरूनी ने संस्कृति की उन पांडुलिपियों का जो उसने देखी थीं और उनमें से कुछ नकलनवीसों की गलतियों आदि का उल्लेख किया है। अल-बिरूनी को अपने ग़ज़नी-प्रवास के दौरान भारत विषयक अध्ययन के लिए अधिक अवसर मिले होंगे।

ग़ज़नी शहर पूर्वी क्षेत्र में इस्लाम का प्रमुख राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र था और उसने पड़ोसी देशों में जिनमें भारत भी शामिल है कुशल व्यक्तियों को आकर्षित किया होगा। उसमें अनेक भारतीय युद्धबंदी, कुशल शिल्प और विद्वान भी थे जो महमूद के भारत पर आक्रमण के बाद लाए गए होंगे। इसके अलावा पंजाब भी जिसमें हिन्दुओं का भारी बहुमत था, ग़ज़नवी साम्राज्य का ही एक अंग बन गया था। ग़ज़नी तथा भारत के कुछ अन्य नगरों में जहां वह गया होगा1 अल-बिरूनी का अनेक भारतीय विद्वानों और पंडितों से संपर्क हुआ होगा और जिनके साथ जैसा कि एस. के. चटर्जी ने संकेत दिया है उसने पश्चिमी पंजाब की बोली के माध्यम से जिसे अल-बिरूनी ने सीख लिया होगा या फ़ारसी के माध्यम से शास्त्रीय संबंध स्थापित किया होगा जिसे कुछ भारतीयों ने सीख लिया होगा।

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प्रस्तुत आलेख का उद्देश्य छठी सदी ईस्वी के उत्तर भारत के प्रमुख उत्तर गुप्त राजवंश का एक संक्षिप्त, सरल एवं प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करना है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि इस कालखण्ड में भारत में बहुसंख्यक छोटे-बड़े राज्यों का उदय और अस्त देखने को मिलता है। इनमें कुछ ने तो सम्पूर्ण भारत की तत्कालीन राजनीति को न्यूनाधिक रूप से प्रभावित किया जबकि अधिकांश स्थानीय राजवंश एक सीमित परिक्षेत्र में ही उत्थित हुए और विलीन हो गये।

गुप्तोत्तर कालीन भारतीय इतिहास अनेक नवीन प्रवृत्तियों संक्रमण का काल था। इन नवीन प्रवृत्तियों ने छठी सदी ईस्वी से बारहवीं सदी ईस्वी तक के राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास को समान रूप से प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप युगान्तकारी परिवर्तन हुए। इस कालखण्ड में ‘आसमुद्र क्षितीशों’ की परम्परा समाप्त हो गयी। गुप्तों एवं वाकाटकों की साम्राज् सत्ता के विघटन के साथ ही भारत के राजनैतिक क्षितिज पर अनेक क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ और सामन्तवादी व्यवस्था के अन्तर्गत बहुसंख्यक छोटे-छोटे स्थानीय राजवंश अस्तित्त्व में आये। इन्होंने अवसर पाते ही अपनी स्वतंत्र सत्ता की स्थापना कर राज्य विस्तार का कभी असफल तो कभी सफल प्रयत्न किया। इस प्रकार इस काल खण्ड सम्पूर्ण भारत में बहुसंख्यक स्थानीय राजवंशों के उत्थान और पतन का दृश्य देखने को मिलता है। स्वाभावतः सार्वभौम-सत्ता के स्वामी राजवंशों की तुलना में स्थानीय राजवंश सामरिक शक्ति एवं आर्थिक स्थिति, इन दोनों दृष्टियों से दुर्बल थे। दूसरे अपनी राज्यसीमाओं के विस्तार की आकांक्षा से वे परस्पर संघर्षरत भी थे। इन्होंने अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं को ढकने के लिए आडम्बरपूर्ण जीवनशैली अपनायी।

विराट् उपाधियों द्वारा स्वयं का अलंकरण करना, अपने नीचे सामन्तों की विविध स्तरीय श्रेणियों का सृजन, अपव्ययपूर्ण निर्माण कार्यों में अभिरूचि और विलासितापूर्ण जीवन, सामन्तवाद के कुछ प्रमुख लक्षण थे, जिन्होंने समवेत रूप से एक ओर तो राजशक्ति को दुर्बल बनाया वहीं दूसरी ओर प्रजा की आर्थिक स्थिति को भी जर्जर कर दिया। उल्लेखनीय है कि सार्वभौम सत्ता के अभाव में व्यापारिक मार्ग असुरक्षित हुए और व्यापारिक गतिविधियां बाधित हुयीं। परिणामतः व्यापार और वाणिज्य के साथ-साथ उद्योगों का विकास भी अवरूद्ध हो गया। इसकाल में मुद्राओं के प्रचलन एवं उपयोग का आभाव स्पष्टतः नागर और वाणिज्य प्रधान अर्थव्यवस्था के ह्रास का सूचक है। अर्थव्यवस्था प्रधानताः कृषि पर अवलम्बित हो गयी। फलतः इस काल खण्ड में कृषकों की स्थिति भी दुर्दशाग्रस्त हो गई। स्पष्टतः राजनीतिक क्षेत्र में उत्पन्न अव्यवस्था ने समकालीन अर्थतंत्र को भी प्रभावित किया।

राजनीतिक एवं आर्थिक दौर्बल्य के युग में उत्तर भारत को विदेशी आक्रमणकारियों के हाथों भी पराजित और अपमानित होना पड़ा। उल्लेखनीय है कि हूणों का भारत पर पहला आक्रमण गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त के शासन काल में हुआ था, जिसमें हूण आक्रमणकारिय़ों को बुरी तरह पराजित होना पड़ा था। किंतु गुप्त सत्ता के अवसान काल में हूण आक्रमणकारी पुनः सक्रिय हो उठे थे। तोरमाण और मिहिरकुल के नेतृत्त्व में हूणों ने गुजरात और मालवा से लेकर गंगा की घाटी तक आक्रमण और विनाश का दृश्य उपस्थित किया। आगे चलकर हूणों ने पंजाब और मध्य भारत में अपने छोटे-छोटे राज्य भी स्थापित किये। हूण आक्रमण की ज्वाला के शमन के बाद आठवीं शताब्दी में सिन्ध, गुजरात और मालवा क्षेत्र पर अरबों के आक्रमण प्रारम्भ  हुए। यद्यपि मलवा के गुर्जर प्रतिहारों ने अरब शक्ति के प्रवाह को रोकने का सफल रूप से प्रयत्न किया तथापि सिन्ध का क्षेत्र अरब आक्रमणकारियों के राजनैतिक प्रभुत्त्व में चला गया।

 इसके कुछ ही समय पश्चात् पश्चिमोत्तर दिशा से तुर्क आक्रमण का संकट उत्पन्न हुआ। तुर्क आक्रमणकारियों का दबाव धीरे-धीरे पश्चिम में गुजरात के समुद्रतटवर्ती क्षेत्रों तक और पूर्व में गंगा की घाटी तक बढ़ता गया। सबसे पहले तुर्कों ने पश्चिमी पंजाब (आधुनिक पाकिस्तान) को अपने आधीन किया और उसके बाद उसके आक्रमणों की जो अनवरत् आंधी उठनी प्रारम्भ हुयी उसे रोकने में परस्पर ईर्ष्यालु और युद्धरत क्षेत्रिय राज्यों के अदूरदर्शी भारतीय शासक सर्वथा असफल सिद्ध हुए और धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्रता भी खो बैठे। चाहमान, गाहड़वाल, चौलुक्य, चन्देल एवं परमार आदि राजवंशो के पतन से न केवल भारत के राजनैतिक इतिहास का एक युग समाप्त हुआ वरन् सांस्कृतिक परम्पराओं के समक्ष भी एक ऐसी चुनौती उपस्थित हुयी जिसने इतिहास की धारा को एक अकल्पनीय मोड़ दिया। यद्यपि नर्मदा के दक्षिण का भारत इस कालखण्ड में बाहृय आक्रमणों से मुक्त रहा तथापि इस क्षेत्र में भी स्थानीय राजवंश अपने गौरव, अभिमान और क्षेत्र विस्तार की महत्त्वाकांक्षा के कारण परस्पर संघर्षरत और सामन्तवादी प्रवृतियों से पीड़ित रहे।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि केन्द्रापसारी  शक्तियों के अभ्युदय के कारण जहाँ देश की सांस्कृतिक एवं राजनैतिक एकता की भावना दुर्बल हुयी वहीं सांस्कृतिक जीवन की विविधता एवं वैभव में वृद्धि भी हुयी। इस कालखण्ड में मूर्तिकला एवं वास्तुकला की विविध शैलियां विकसित हुयीं, जिन्होंने अनेक उत्कृष्ट वास्तु संरचनाओं एवं कलाकृतियों को जन्म दिया। विविध स्थानीय भाषाओं, बोलियों का विकास प्रारम्भ हुआ तथा स्थानीय शासकों के संरक्षण में अनेक श्रेष्ठ काव्य कृतियों का सृजन हुआ। इस प्रकार हम देखते हैं कि राजनैतिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य अधिकांशतः नैराश्यपूर्ण होते हुए भी सर्वथा अवदान रहित नहीं था।

उत्तर गुप्त राजवंश

सुप्रसिद्ध गुप्त राजवंश का अवसान 550-51 ईस्वी में हुआ और इसके साथ ही उत्तर भारतीय राजनीति में रिक्तता के साथ-साथ अस्थिरता एवं अराजकता का वातावरण भी उत्पन्न हुआ। गुप्त सम्राटों के अधीन उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शासन करने वाले अनेक स्थानीय राजवंश इस रिक्तता को भरने के लिए अपनी शक्ति के संवर्धन में लग गये। परिणामतः उनमें प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हुयी, जिसने पारस्परिक संघर्षों को जन्म दिया। कतिपय सामन्त राजवंश मगध और उसके पार्श्ववर्ती क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर साम्राज्यवादी शक्ति बनने का स्वप्न देखने लगे इनमें उत्तर गुप्त, मौखरि एवं थानेश्वर के पुष्यभूति राजवंश का नाम यहाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यद्यपि छठी शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्द्ध में उत्तर भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले सभी राजवंशों के सन्दर्भ में प्रचुर सूचनाएं उपलब्ध नहीं हैं तथापि आभिलेखिक  एवं साहित्यिक स्रोतों से उत्तर गुप्त, मौखरी एवं पुष्यभूति राजवंश के सन्दर्भ में अपेक्षाकृत अधिक सूचनाएं उपलब्ध हैं। अतएव इतिहासकारों ने इन राजवंशों का इतिहास उपलब्ध साक्ष्यों के समवेत विवेचन के आधार पर प्रमाणिक रूप से प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। गुप्तोत्तरकालीन इतिहास का विवरण प्रस्तुत करते हुए इस आलेख में भी क्रमशः उत्तरगुप्त राजवंश का इतिहास प्रस्तुत कर रहे हैं।

उत्तर गुप्त राजवंश के इतिहास को प्रकाशित करने वाले अभिलेखों में आदित्यसेन का अफसढ़ अभिलेख तथा जीवित गुप्त द्वितीय का देववर्णाक अभिलेख विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त आदित्यसेन के समय के दो अभिलेख शाहपुर और मन्दार नामक स्थानों तथा विष्णुगुप्त के काल का एक अभिलेख मंगराव नामक स्थान से प्राप्त हुआ है। किंतु ऐतिहासिक दृष्टि से ये विशेष सूचना प्रदायी नहीं हैं। यहाँ यह ध्यातव्य है कि ये सभी लेख बिहार प्रान्त से प्राप्त हुए हैं। उदाहणार्थ अफसढ़ अभिलेख गया जिले में स्थित अफसढ़ नामक स्थान में मिला है, जो इस वंश के प्रथम शासक कृष्ण गुप्त से लेकर आदिसेन तक के काल के ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख करता है। इससे हमें आदित्यसेन तक उत्तरगुप्त राजवंशावली का ज्ञान तो होता ही है साथ ही इससे उत्तरगुप्त मौखरी सम्बन्धों पर भी रोचक प्रकाश पड़ता है। देववर्णाक अभिलेख बिहार प्रान्त के शाहाबाद (आरा) जिले के देववर्णाक नामक स्थान से मिला है।

इस अभिलेख को प्रकाश में लाने का श्रेय कनिंघम महोदय को है। उन्होंने 1880 ईस्वी में इसे प्राप्त किया था। इस अभिलेख से उत्तरगुप्त राजवंश के अंतिम तीन शासकों  देव गुप्त, विष्णु गुप्त एवं जीवित गुप्त द्वितीय  के काल के इतिहास के सम्बन्ध में सूचनाएं मिलती हैं। इस प्रकार अफसढ़ एवं देववर्णाक से प्राप्त अभिलेख एक साथ दृष्टि में रखने पर हमें इस वंश के ग्यारह शासकों का अविच्छिन्न इतिहास ज्ञात हो जाता है। चूँकि कृष्ण गुप्त इस वंश का प्रथम शासक तथा जीवित गुप्त द्वितीय इस वंश का अन्तिम शासक था। अतः सम्प्रति इस राजवंश का सम्पूर्ण इतिहास न्यूनाधिक रूप से ज्ञात है, तथापि इस वंश के इतिहास के सम्बन्ध में अभी भी अनेक ऐसी सूचनाएँ हैं जो विवादस्पद बनी हुई हैं। जिनके सम्बन्ध में उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर कोई निर्णायक मत व्यक्त करना दुष्कर है।

उत्पत्ति एवं आदि राज्य

उत्तर गुप्त राजवंश का संस्थापक कृष्ण गुप्त को अफसढ़ अभिलेख में ‘सदवंश’ में उत्पन्न बताया गया है। इससे केवल इतना ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह किसी उच्चकुल से सम्बद्ध था। इससे अधिक उत्तर गुप्तों की उत्पत्ति के संबंध में हमें कोई सूचना नहीं मिलती। इस वंश के अधिकांश शासकों  के नाम के साथ ‘गुप्त’ शब्द जुड़ा हुआ है। अतः कतिपय विद्वानों के द्वारा यह सम्भावना व्यक्त की गई है कि ये चक्रवर्ती गुप्त राजवंश से सम्बन्धित रहे होंगे। किंतु यह सम्भावना निर्मूल प्रतीत होती है। क्योंकि यदि ये चक्रवर्ती गुप्तों से सम्बद्ध होते तो इनके लेखों में निश्चय ही गर्व पूर्वक इस बात का उल्लेख किया गया होता। तो भी उल्लेखनीय है कि इस वंश के सभी राजाओं के नाम के अन्त में गुप्त शब्द नहीं मिलता।
 
ध्यातव्य है कि इस वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक का नाम आदित्यसेन मिलता है। सम्भवतः उत्तर गुप्त राजवंश, सम्राट गुप्तों के आधीन शासन करने वाला एक सामन्त राजवंश था। क्योंकि इस वंश के प्रथम शासक कृष्ण गुप्त को केवल नृप उपाधि प्रदान की गई है तथा इसके उत्तराधिकारी हर्ष गुप्त के नाम के साथ केवल आदर सूचक ‘श्री’ शब्द का प्रयोग मिलता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि चक्रवर्ती गुप्तों से पृथक करने के लिए ही इतिहासकारों ने इस वंश को परवर्ती गुप्त वंश अथवा उत्तर गुप्त वंश कह कर सम्बोधित किया है। कुछ इतिहासकारों ने इस नामकरण पर आपत्ति भी की है। सुधाकर चट्टोपाध्याय का सुझाव था कि इस वंश का नामकरण उनके संस्थापक कृष्ण गुप्त के नाम पर करना चाहिए तथा इसे ‘कृष्ण गुप्तवंश’ कहा जाना चाहिए।


गुप्त राजवंश अथवा उत्तर गुप्त राजवंश अब इतिहासकारों के बीच अधिकांशतः स्वीकृत और बहुमान्य हो चुका है। उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र कौन सा था ? यह विषय आज भी विवादास्पद बना हुआ है। इस राजवंश के पश्चात्वर्ती शासकों आदित्यसेन, विष्णु गुप्त एवं जीवित गुप्त द्वितीय के अभिलेख मगध क्षेत्र से ही प्राप्त हुए हैं। जिनसे यह इंगित है कि इन तीन शासकों का शासन मगध क्षेत्र पर व्याप्त था। अतः फ्लीट आदि विद्वानों ने यह मत व्यक्त किया है कि इस राज्यवंश का  मूल क्षेत्र भी मगध ही रहा होगा।1 इसके विपरीत डी. सी. गांगुली, आर. के. मुकर्जी, सी. बी. वैद्य, हार्नले एवं रायचौधरी आदि अनेक विद्वानों  का यह विचार है कि इस वंश के लोग मूलतः मलवा के निवासी थे जो हर्षोत्तर काल में मगध के शासक बने।2 मालवा को उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र मानने वाले विद्वान का मुख्य तर्क यह है कि हर्षचरित में माधव गुप्त का उल्लेख मालवराज पुत्र के रूप में हुआ है। जबकि अफसढ़ अभिलेख में माधव गुप्त को महासेन गुप्त का पुत्र कहा गया है। दोनों को ही स्रोतों में माधव गुप्त को हर्ष का मित्र कहा गया है।

हर्षचरित के अनुसार वह हर्ष का बाल सखा था जबकि अफसढ़ अभिलेख के अनुसार वह हर्ष देव के निरन्तर साहचर्य का आकांक्षी था। इन दोनों स्रोतों को साथ-साथ देखने से हर्षचरित के मालवराज और आदित्यसेन के पितामह महासेन गुप्त की एकरूपता प्रमाणित होती है। यहां यह भी ध्यातव्य है कि जीवित गुप्त द्वितीय के देववर्णाक अभिलेख के अनुसार मगध पर पहले मौखरी सर्ववर्मा और अवन्तिवर्मा का अधिकार था, जो उत्तर गुप्त वंश के शासक दामोदर गुप्त और महासेन गुप्त के समकालीन थे। इस बात की भी प्रबल सम्भावना है कि मगध का क्षेत्र सर्ववर्मा के पिता ईशानवर्मा  के भी आधीन रहा हो, जो उत्तर गुप्त वंशी शासक कुमार गुप्त का समकालीन था। क्योंकि  ईशानवर्मा के हड़हा अभिलेख में ईशानवर्मा को आन्ध्रों, शूलिकों तथा गौड़ों का विजेता कहा गया है और गौड़ की विजय मगध क्षेत्र पर अधिकार के बिना सम्भव नहीं प्रतीत होती। इन सभी तथ्यों को दृष्टि में रखने पर पूर्वी मालवा के क्षेत्र को ही उत्तर गुप्तों का मूल क्षेत्र मानना युक्ति संगत लगता है।
 

 कृष्ण गुप्त 

असफढ़ अभिलेख के अनुसार उत्तर गुप्त वंश का प्रथम शासक कृष्ण गुप्त था। अभिलेख के अतैथिक होने के कारण कृष्ण गुप्त का शासनकाल सुनिश्चित रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता तथापि इस दिशा में हमें ईशानवर्मा के हड़हा अभिलेख से सहायता मिलती है, जिसकी तिथि 554 ईस्वी है। ईशानवर्मा उत्तर गुप्त वंशी नरेश कुमार गुप्त का शासनकाल स्थूलतः 540 ईस्वी और 560 ईस्वी के बीच निर्धारित किया जा सकता है। चूंकि कुमार गुप्त के पूर्व जीवित गुप्त प्रथम, हर्ष गुप्त और कृष्ण गुप्त इन तीन शासकों ने राज्य किया और यदि प्रत्येक शासक के लिए औसत बीस वर्ष का शासनकाल निर्धारित किया जाय तो कृष्ण गुप्त का शासन काल लगभग 480 ईस्वी से 500 ईस्वी के बीच रखा जा सकता है।

अफसढ़ अभिलेख में कृष्ण गुप्त को ‘नृप’ उपाधि से विभूषित किया गया है।1 इस समय गुप्त साम्राट बुध गुप्त शासन कर रहा था जिसका राजनैतिक प्रभाव मालवा क्षेत्र तक निश्चित रूप से व्याप्त था। बुध गुप्त के शासनकाल में ही हूण नरेश तोरमाण का पश्चिमी भारत पर आक्रमण हुआ। तोरमाण के शासन का प्रथम वर्ष का अभिलेख एरण से प्राप्त हुआ है। इससे यह विदित होता है कि 490 ईस्वी और 510 ईस्वी  के बीच किसी समय तोरमाण का अधिकार मालवा क्षेत्र पर स्थापित हुआ। उसने बुध गुप्त के एरण क्षेत्र पर शासन करने वाले सामन्त मातृविष्णु के अनुज धान्यविष्णु को अपनी ओर से इस क्षेत्र का प्रशासक नियुक्त किया। किंतु मालवा क्षेत्र में हूणों की यह सत्ता निर्विध्न नहीं रही। क्योंकि एरण से ही प्राप्त 510 ईस्वी के भानु गुप्त के अभिलेख से ज्ञात होता है कि भानु गुप्त ने, जो एक महान योद्धा था एरण में एक भीषण युद्ध किया, जिसमें उसका मित्र गोपराज वीरगति को प्राप्त हुआ था और उसकी पत्नी अपने पति के शव के साथ सती हो गई थी।

समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुए इतिहासकारों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि भानु गुप्त और गोपराज ने यह युद्ध हूण नरेश तोरमाण के विरूद्ध ही किया होगा। स्पष्टतः मालवा क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य में तेजी के साथ परिवर्तन हो रहा था जिससे मध्य भारत के परिव्राजक, उच्चकुल तथा एरण क्षेत्र के धान्यविष्णु जैसे सामन्त कुलों की गुप्त सम्राटों के प्रति स्वामिभक्ति शिथिल और संदिग्ध होती जा रही थी। सम्भवतः उन्हीं परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए कृष्ण गुप्त ने पूर्वी मालवा में अपना छोटा सा राज्य स्थापित किया। यद्यपि अफसढ़ अभिलेख में यह कहा गया है कि उसकी सेना में सहस्रों की संख्या में हाथी थे तथा वह असंख्य युद्धों का विजेता था एवं विद्वानों से सदैव वह घिरा रहता था, किन्तु इसे औपचारिक प्रशंसा मात्र ही समझना चाहिए।

हर्ष गुप्त

कृष्ण गुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र हर्ष गुप्त था। इसका शासनकाल लगभग 500 ईस्वी से 520 ईस्वी तक था। अफसढ़ अभिलेख में कहा गया है कि इसने अनेक दुधर्ष युद्धों में विजय प्राप्त किया था। इसका शासन काल भी हूणों के आक्रमण के कारण उथल-पुथल का काल था। यह हूण आक्रान्ता तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल दोनों का समकालीन था। इस समय गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य हूणों के साथ संघर्ष में उलझा हुआ था। कुछ विद्वानों का यह मानना है कि नरसिंह गुप्त का शासन मगध क्षेत्र में ही सीमित था, जबकि बंगाल के क्षेत्र में कदाचित वैन्य गुप्त ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था तथा मालवा क्षेत्र में सम्भवतः भानु गुप्त हूणों के विरूद्ध संघर्षरत था।

अफसढ़ अभिलेख में हर्ष गुप्त के लिए स्वतंत्र शासक के लिए प्रयुक्त होने वाली किसी उपाधि का प्रयोग नहीं है। अतः उसकी स्थित एक सामान्त की ही प्रतीत होती है। यह कहना कठिन है कि वह तत्कालीन गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य अथवा भानु गुप्त के अधीन शासन कर रहा था या उसने हूणों की अधिसत्ता स्वीकार कर ली थी। यह भी सम्भावना व्यक्त की गयी है कि वह मालवा के यशोधर्मन का भी समकालीन था। किंतु दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। इसकी बहन हर्ष गुप्ता का विवाह मौखरी नरेश आदित्यवर्मा के साथ हुआ था। इस प्रकार हर्ष गुप्त के शासनकाल में उत्तर गुप्त एवं मौखरी राजकुलों के पारस्परिक सम्बन्ध मित्रतापूर्ण दिखाई देते हैं। वस्तुतः ये दोनों ही राजकुल विकासोन्मुख थे। अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ये परस्पर सहयोगी बनें और मैत्री सम्बन्ध को सु़दृढ़ करने के लिए वैवाहिक सम्बन्ध का आश्रय लिया।

जीवित गुप्त प्रथम  

हर्ष गुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र जीवित गुप्त प्रथम था। इसने लगभग 520 ईस्वी से 540 ईस्वी तक शासन किया। अफसढ़ अभिलेख से उपलब्ध सूचनओं से यह संकेत मिलता है कि यह अपने पिता एवं पितामाह की तुलना में अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ। इसे अभिलेख में ‘क्षितीशचूड़ामणि’1 उपाधि से विभूषित किया गया है। अफसढ़ अभिलेख में इसके राजनीतिक प्रभावों की चर्चा करते हुए यह कहा गया है कि ‘वह समुद्रतटवर्ती हरित प्रदेश तथा हिमालय के पार्शववर्ती शीत प्रदेश के शत्रुओं के लिए दाहक ज्वर के सदृश था।’1 ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्त-साम्राज्य पर हूणों के आक्रमण एवं मालवा शासक यशोवर्धन के दिग्विजय के परिणाम स्वरूप उत्तर भारत में राजनीतिक अव्यवस्था की भयावह स्थिति उतपन्न हो चुकी थी।

गुप्त सम्राटों का प्रताप-सूर्य अस्त हो रहा था और हिमालय के सीमावर्ती क्षेत्रों सहित उत्तरी बंगाल के क्षेत्रों से गुप्त सत्ता का प्रभाव समाप्त हो चला था। असम्भव नहीं है कि जीवित गुप्त प्रथम ने समकालीन गुप्त सम्राट, जो सम्भवतः कुमार गुप्त तृतीय था, के सामन्त के रूप में पूर्वी भारत में विद्रोहों का दमन करने के लिए यह अभियान किया हो। ऐसा प्रतीत होता है कि इस अभियान में समकालीन मौखरी नरेश ईश्वर वर्मा ने भी उसका सहयोग किया। क्योंकि जौनपुर शिलालेख में यह कहा गया है कि ईश्वर वर्मा ने उत्तर की दिशा में हिमालय तक के क्षेत्रों (प्रालेयाद्रि) पर विजय प्राप्त की थी। इन विजयों के परिणाम स्वरूप जीवित गुप्त के शासनकाल में उत्तर गुप्तों के राजनीतिक प्रभाव में वृद्धि हुई। इसलिए अफसढ़ अभिलेख में यह कहा गया है  कि ‘उसका पराक्रम पवन पुत्र हनुमान द्वारा समुद्र लंघन के समान अमानुषिक था।

कुमार गुप्तः

जीवित गुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी उसका पुत्र कुमार गुप्त हुआ। इसका शासनकाल लगभग 540 ईस्वी से से 560 ईस्वी तक माना गया है। इसके शासन के प्रायः मध्यकाल में (550-51ईस्वी) गुप्त सम्राट विष्णु गुप्त की मृत्यु हुई एवं गुप्त राजवंश का पूर्णतः अंत हो गया। गुप्त राजवंश के पतन का लाभ उठाने की दिशा में उत्तर गुप्त और मौखरी दोनों ही राजवंश सक्रिय हो उठे। परिणामतः इन दोनों राजकुलों का पारस्परिक मैत्री सम्बन्ध समाप्त हो गया। अफसढ़ अभिलेख से दोनों कुलों के बीच शत्रुता एवं संघर्ष की स्पष्ट सूचना मिलती है। इस अभिलेख के अनुसार कुमार गुप्त एवं उसके समकालीन मौखरी नरेश ईशानवर्मा के बीच भीषण संघर्ष हुआ। कदाचित इस संघर्ष का उद्देश्य मगध के क्षेत्र पर, जो साम्राज्य सत्ता का प्रतीक था, अधिकार स्थापित करना था।

उत्तर गुप्त नरेश कुमार गुप्त एवं मौखरी नरेश ईशानवर्मा के बीच संघर्ष की सूचना देने वाला एकमात्र स्रोत अफसढ़ अभिलेख है। इस अभिलेख के अनुसार कुमार गुप्त ने ‘राजाओं में चन्द्रमा के समान शक्तिशाली ईशानवर्मा के सेना रूपी क्षीरसागर का, जो लक्ष्मी की सम्प्राप्ति का साधन था, मन्दराचल पर्वत की भाँति मंथन किया। इस श्लोक में निहित अर्थ को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मतभेद है। रायचौधरी का मत है कि इस युद्ध में कुमार गुप्त की विजय हुई तथा ईशानवर्मा पराजित  हुआ। क्योंकि मौखरियों द्वारा इस युद्ध में विजय का कोई दावा नहीं किया गया। उल्लेखनीय है कि ईशानवर्मा के 554 ईस्वी के हड़हा अभिलेख में इस युद्ध का कोई वर्णन नहीं है। अतः इस बात की प्रबल सम्भावना है कि यह युद्ध 554 ईस्वी के बाद किसी समय हुआ होगा। अफसढ़ अभिलेख के आगे के श्लोक में यह कहा गया है कि इस युद्ध के बाद कुमार गुप्त ने प्रयाग में अग्निप्रवेश कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी।1 निहाररंजन राय और राधाकुमुद मुकर्जी जैसे विद्वानों का मत है कि इस युद्ध में कुमार गुप्त पराजित हुआ था और उसने पराजय जनित ग्लानि के कारण प्रयाग में आत्महत्या की थी।

महिलाओं और पुरुषों ने कार्य की तलाश में प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए व्यापारियों सैनिकों पुरोहितों और तीर्थयात्रियों के रूप में या फिर साहस की भावना से प्रेरित होकर यात्राएँ की हैं। वे जो किसी नए स्थान पर आते हैं अथवा बस जाते हैं निश्चित रूप से एक ऐसी दुनिया को समक्ष पाते हैं जो भूदृश्य या भौतिक परिवेश के संदर्भ में और साथ ही लोगों की प्रथाओं भाषाओं आस्था तथा व्यवहार में भिन्न होती है। इनमें से कुछ इन भिन्नताओं के अनुरूप ढल जाते हैं और अन्य जो कुछ हद तक विशिष्ट होते हैं इन्हें ध्यानपूर्वक अपने वृत्तांतों में लिख लेते हैं जिनमें असामान्य तथा उल्लेखनीय बातों को अधिक महत्व दिया जाता है।

दुर्भाग्य से हमारे पास महिलाओं द्वारा छोड़े गए वृत्तांत लगभग न के बराबर हैं हालाँकि हम यह जानते हैं कि वे भी यात्राएँ करती थीं। सुरक्षित मिले वृत्तांत अपनी विषयवस्तु के संदर्भ में अलग-अलग प्रकार के होते हैं। कुछ दरबार की गतिविधियों से संबंधित होते हैं जबकि अन्य धार्मिक विषयों या स्थापत्य के तत्वों और स्मारकों पर केंद्रित होते हैं। उदाहरण के लिए पंद्रहवीं शताब्दी में विजयनगर शहर के सबसे महत्वपूर्ण विवरणों में से एक हेरात से आए एक राजनयिक अब्दुर रज्जाक समरकंदी से प्राप्त होता है। कई बार यात्री सुदूर क्षेत्रों में नहीं जाते हैं। उदाहरण के लिए मुगल साम्राज्य  में प्रशासनिक अधिकारी कभी-कभी साम्राज्य के भीतर ही भ्रमण करते थे और अपनी टिप्पणियाँ दर्ज करते थे। इनमें से कुछ अपने ही देश की लोकप्रिय प्रथाओं तथा जन-वार्ताओं और परंपराओं को समझना चाहते थे।

हम यह देखेंगे कि उपमहाद्वीप में आए यात्रियों द्वारा दिए गए सामाजिक जीवन के विवरणों के अधययन से किस प्रकार हम अपने अतीत के विषय में ज्ञान बढ़ा सकते हैं। इसके लिए हम तीन व्यक्तियों के वृत्तांतों पर ध्यान देंगे: अल-बिरूनी जो ग्यारहवीं शताब्दी में उज्बेकिस्तान आया था इब्नबतूता ;चौदहवीं शताब्दी मोरक्को से तथा फांसीसी यात्री फांस्वा बर्नियर ;सत्रहवीं शताब्दी।

1- अल-बिरूनी तथा किताब-उल-हिन्द

1-1 ख्व़ारिज्म से पंजाब तक

अल-बिरूनी का जन्म आधुनिक उज्बेकिस्तान में स्थित ख्व़ारिज्म में सन्‌ 973 में हुआ था। ख्व़ारिज्म शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र था और अल-बिरूनी ने उस समय उपलब्ध सबसे अच्छी शिक्षा प्राप्त की थी। वह कई भाषाओं का ज्ञाता था जिनमें सीरियाई फारसी हिब्रू तथा संस्कृत शामिल हैं। हालाँकि वह यूनानी भाषा का जानकार नहीं था पर फिर भी वह प्लेटो तथा अन्य यूनानी दार्शनिकों के कार्यों से पूरी तरह परिचित था जिन्हें उसने अरबी अनुवादों के माध्यम से पढ़ा था। सन्‌ 1017 ई- में ख्व़ारिज्म पर आक्रमण के पश्चात सुल्तान महमूद यहाँ के कई विद्वानों तथा कवियों को अपने साथ अपनी राजधानी गजनी ले गया। अल-बिरूनी भी उनमें से एक था। वह बंधक के रूप में ग्ज़ानी आया था पर धीरे-धीरे उसे यह शहर पसंद आने लगा और सत्तर वर्ष की आयु में अपनी मृत्यु तक उसने अपना बाकी जीवन यहीं बिताया। ग़जनी में ही अल-बिरूनी की भारत के प्रति रुचि विकसित हुई। यह कोई असामान्य बात नहीं थी। आठवीं शताब्दी से ही संस्कृत में रचित खगोल विज्ञान गणित और चिकित्सा संबंधी कार्यों का अरबी भाषा में अनुवाद होने लगा था। पंजाब के ग़जनवी साम्राज्य का हिस्सा बन जाने के बाद स्थानीय लोगों से हुए संपर्कों ने आपसी विश्वास और समझ का वातावरण बनाने में मदद की। अल-बिरूनी ने ब्राह्मण पुरोहितों तथा विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए और संस्कृत धर्म तथा दर्शन का ज्ञान प्राप्त किया। हालाँकि उसका यात्रा-कार्यक्रम स्पष्ट नहीं है फिर भी प्रतीत होता है कि उसने पंजाब और उत्तर भारत के कई हिस्सों की यात्रा की थी। उसके लिखने के समय यात्रा वृत्तांत अरबी साहित्य का एक मान्य हिस्सा बन चुके थे। ये वृत्तांत पश्चिम में सहारा रेगिस्तान से लेकर उत्तर में वोल्गा नदी तक फैले क्षेत्रों से संबंधित थे। इसलिए हालाँकि 1500 ई- से पहले भारत में अल-बिरूनी को कुछ ही लोगों ने पढ़ा होगा भारत से बाहर कई अन्य लोग संभवत: ऐसा कर चुके हैं।

1-2 किताब-उल-हिन्द

अरबी में लिखी गई अल-बिरूनी की कृति ‘किताब-उल-हिन्द’ की भाषा सरल और स्पष्ट है। यह एक विस्तृत ग्रंथ है जो धर्म और दर्शनत्योहारों खगोल-विज्ञान कीमिया रीति-रिवाजों तथा प्रथाओं सामाजिक जीवन भार-तौल तथा मापन विधियों मूर्तिकला कानून मापतंत्र विज्ञान आदि विषयों के आधार पर अस्सी अधयायों में विभाजित है। सामान्यत: ;हालाँकि हमेशा नहीं अल-बिरूनी ने प्रत्येक अधयाय में एक विशिष्ट शैली का प्रयोग किया जिसमें आरंभ में एक प्रश्न होता था फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन और अंत में अन्य संस्कृतियों के साथ एक तुलना। आज के कुछ विद्वानों का तर्क है कि इस लगभग ज्यामितीय संरचना जो अपनी स्पष्टता तथा पूर्वानुमेयता के लिए उल्लेखनीय है का एक मुख्य कारण अल-बिरूनी का गणित की ओर झुकाव था। अल-बिरूनी जिसने लेखन में भी अरबी भाषा का प्रयोग किया था ने संभवत: अपनी कृतियाँ उपमहाद्वीप के सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए लिखी थीं।

वह संस्कृत पाली तथा प्राकृत ग्रंथों के अरबी भाषा में अनुवादों तथा रूपांतरणों से परिचित था-इनमें दंतकथाओं से लेकर खगोल-विज्ञान और चिकित्सा संबंधी कृतियाँ सभी शामिल थीं। पर साथ ही इन ग्रंथों की लेखन-सामग्री शैली के विषय में उसका दृष्टिकोण आलोचनात्मक था और निश्चित रूप से वह उनमें सुधार करना चाहता था।

2- इब्नबतूता का रिह्‌ला

2-1 एक आरंभिक विश्व-यात्री

इब्नबतूता द्वारा अरबी भाषा में लिखा गया उसका यात्रा वृत्तांत जिसे रिह्‌ला कहा जाता है चौदहवीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन के विषय में बहुत ही प्रचुर तथा रोचक जानकारियाँ देता है। मोरक्को के इस यात्री का जन्म तैंजियर के सबसे सम्मानित तथा शिक्षित परिवारों में से एक जो इस्लामी कानून अथवा शरियत पर अपनी विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था में हुआ था। अपने परिवार की परंपरा के अनुसार इब्नबतूता ने कम उम्र में ही साहित्यिक तथा शास्त्ररूढ़ शिक्षा हासिल की। अपनी श्रेणी के अन्य सदस्यों के विपरीत इब्नबतूता पुस्तकों के स्थान पर यात्राओं से अर्जित अनुभव को ज्ञान का अधिक महत्वपूर्ण स्रोत मानता था। उसे यात्राएँ करने का बहुत शौक था और वह नए-नए देशों और लोगों के विषय में जानने के लिए दूर-दूर के क्षेत्रों तक गया। 1332-33 में भारत के लिए प्रस्थान करने से पहले वह मक्का की तीर्थ यात्राएँ और सीरिया इराक फारस यमन ओमान तथा पूर्वी आफ्रीका के कई तटीय व्यापारिक बंदरगाहों की यात्राएँ कर चुका था। मध्य एशिया के रास्ते होकर इब्नबतूता सन्‌ 1333 में स्थलमार्ग से सिधं पहुचँा। उसने दिल्ली के सुल्तान महुम्मद बिन तुगलक केे बारे में सुना था और कला और साहित्य के एक दयाशील संरक्षक के रूप में उसकी ख्याति से आकर्षित हो बतूता ने मुल्तान और उच्छ के रास्ते होकर दिल्ली की ओर प्रस्थान किया।

सुल्तान उसकी विद्वता से प्रभावित हुआ आरै उसे दिल्ली का  फाजी या न्यायाधीश नियुक्त किया। वह इस पद पर कई वर्षों तक रहा पर फिर उसने विश्वास खो दिया और उसे कारागार में केद कर दिया गया। बाद में सुल्तान और उसके बीच की गलतफहमी दूर होने के बाद उसे राजकीय सेवा में पुनर्स्थापित किया गया और 1342 ई- में मंगोल शासक के पास सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश दिया गया। अपनी नयी नियुक्ति के साथ इब्न बतूता मध्य भारत के रास्ते मालाबार तट की ओर बढ़ा। मालाबार से वह मालद्वीप गया जहाँ वह अठारह महीनों तक व्फ़ााजी के पद पर रहा पर अंतत: उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया। बाद में एक बार फिर वह मालाबार तट तथा मालद्वीप गया और चीन जाने के अपने कार्य को दोबारा शुरू करने से पहले वह बंगाल तथा असम भी गया। वह जहाज से सुमात्रा गया और सुमात्रा से एक अन्य जहाज से चीनी बंदरगाह नगर जायतुन ;जो आज क्वानझू के नाम से जाना जाता है गया। उसने व्यापक रूप से चीन में यात्रा की और वह बीजिंग तक गया लेकिन वहाँ लंबे समय तक नहीं ठहरा। 1347 में उसने वापस अपने घर जाने का निश्चय किया। चीन के विषय में उसके वृत्तांत की तुलना मार्कोपोलो जिसने तेरहवीं शताब्दी के अंत में वेनिस से चलकर चीन ;और भारत की भी की यात्रा की थी के वृत्तांत से की जाती है।

इब्न बतूता ने नवीन संस्कृतियों लोगों आस्थाओं मान्यताओं आदि के विषय में अपने अभिमत को सावधानी तथा कुशलतापूर्वक दर्ज किया। हमें यह ध्यान में रखना होगा कि यह विश्व-यात्री चौदहवीं शताब्दी में यात्राएँ कर रहा था जब आज की तुलना में यात्रा करना अधिक कठिन तथा जोखिम भरा कार्य था। इब्न बतूता के अनुसार उसे मुल्तान से दिल्ली की यात्रा में चालीस और सिंध से दिल्ली की यात्रा में लगभग पचास दिन का समय लगा था। दौलताबाद से दिल्ली की दूरी चालीस जबकि ग्वालियर से दिल्ली की दूरी दस दिन में तय की जा सकती थी। यात्रा करना अधिक असुरक्षित भी था इब्न बतूता ने कई बार डाकुओं के समूहों द्वारा किए गए आक्रमण झेले थे। यहाँ तक कि वह अपने साथियों के साथ कारवाँ में चलना पसंद करता था पर इससे भी राजमार्गों के लुटेरों को रोका नहीं जा सका। मुल्तान से दिल्ली की यात्रा के दौरान उसके कारवाँ पर आक्रमण हुआ और उसके कई साथी यात्रियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा: जो जीवित बचे जिनमें इब्नबतूता भी शामिल था बुरी तरह से घायल हो गए थे।

2-2 जिज्ञासाओं का उपभोग

जैसाकि हमने देखा है कि इब्न बतूता एक हठीला यात्री था जिसने उत्तर पश्चिमी अफ़्रीका  में अपने निवास स्थान मोरक्को वापस जाने से पूर्व कई वर्ष उत्तरी अ़फीका पश्चिम एशिया मध्य एशिया के कुछ भाग हो सकता है वह रूस भी गया हो भारतीय उपमहाद्वीप तथा चीन की यात्रा की थी। जब वह वापस आया तो स्थानीय शासक ने निर्देश दिए कि उसकी कहानियों को दर्ज किया जाए।

3- फांस्वा बर्नियर : एक विशिष्ट चिकित्सक

लगभग 1500 ई- में भारत में पुर्तगालियों के आगमन के पश्चात उनमें से कई लोगों ने भारतीय सामाजिक रीति-रिवाजों तथा धार्मिक प्रथाओं के विषय में विस्तृत वृत्तांत लिखे। उनमें से कुछ चुनिंदा लोगों जैसे जेसुइट रॉबर्टो नोबिली ने तो भारतीय ग्रंथों को यूरोपीय भाषाओं में अनुवादित भी किया। सबसे प्रसिद्ध यूरोपीय लेखकों में एक नाम दुआर्ते बरबोसा का है जिसने दक्षिण भारत में व्यापार और समाज का एक विस्तृत विवरण लिखा। कालान्तर में 1600 ई- के बाद भारत में आने वाले डच अंग्रेज तथा फ़्रांसीसी यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी थी। इनमें एक प्रसिद्ध नाम फ़्रांसीसी जौहरी ज्यौं-बैप्टिस्ट तैवर्नियर का था जिसने कम से कम छह बार भारत की यात्रा की। वह विशेष रूप से भारत की व्यापारिक स्थितियों से बहुत प्रभावित था और उसने भारत की तुलना ईरान और ऑटोमन साम्राज्य से की। इनमें से कई यात्री जैसे इतालवी चिकित्सक मनूकी कभी भी यूरोप वापस नहीं गए और भारत में ही बस गए। फ़्रांस का रहने वाला फ़्रांस्वा बर्नियर एक चिकित्सक राजनीतिक दार्शनिक तथा एक इतिहासकार था। कई और लोगों की तरह ही वह मुगल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में आया था। वह 1656 से 1668 तक भारत में बारह वर्ष तक रहा और मुगल दरबार से नजदीकी रूप से जुड़ा रहा-पहले सम्राट शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह के चिकित्सक के रूप में और बाद में मुगल दरबार के एक आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद ख्ना के साथ एक बुद्धिजीवी तथा वैज्ञानिक के रूप में।

3-1 पूर्व और पश्चिम की तुलना

बर्नियर ने देश के कई भागों की यात्रा की और जो देखा उसके विषय में विवरण लिखे। वह सामान्यत: भारत में जो देखता था उसकी तुलना यूरोपीय स्थिति से करता था। उसने अपनी प्रमुख कृति को फ़्रांस के शासक लुई षप्ट को समर्पित किया था और उसके कई अन्य कार्य प्रभावशाली आधिकारियों और मंत्रियों को पत्रों के रूप में लिखे गए थे। लगभग प्रत्येक दृष्टांत में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया। जैसाकि हम देखेंगे उसका आकलन हमेशा सटीक नहीं था फिर भी जब उसके कार्य प्रकाशित हुए तो बर्नियर के वृत्तांत अत्यधिक प्रसिद्ध हुए। बर्नियर के कार्य फ़्रांस में 1670-71 में प्रकाशित हुए थे और अगले पाँच वर्षों के भीतर ही अंग्रेजी डच जर्मन तथा इतालवी भाषाओं में इनका अनुवाद हो गया। 1670 और 1725 के बीच उसका वृत्तंात फ़्रांसीसी में आठ बार पुनर्मुद्रित हो चुका था और 1684 तक यह तीन बार अंग्रेजी में पुनर्मुद्रित हुआ था। यह अरबी और फ़ारसी वृत्तांतों जिनका प्रसार हस्तलिपियों के रूप में होता था और जो 1800 से पहले सामान्यत: प्रकाशित नहीं होते थे के पूरी तरह विपरीत था।

4- एक अपरिचित संसार की समझ : अल-बिरूनी तथा संस्कृतवादी परंपरा

4-1 समझने में बाधाएँ और उन पर विजय

जैसा कि हमने देखा है यात्रियों ने उपमहाद्वीप में जो भी देखा,सामान्यत: उसकी तुलना उन्होंने उन प्रथाओं से की जिनसे वे परिचित थे। प्रत्येक यात्री ने जो देखा उसे समझने के लिए एक अलग विधि अपनाई। उदाहरण के लिए अल-बिरूनी अपने लिए निर्धार्रित उद्देश्य में निहित समस्याओं से परिचित था। उसने कई अवरोधो की चर्चा की है जो उसके अनुसार समझ में बाधक थे। इनमें से पहला अवरोध भाषा थी। उसके अनुसार संस्कृत अरबी और फारसी से इतनी भिन्न थी कि विचारों और सिद्धांतों को एक भाषा से दूसरी में अनुवादित करना आसान नहीं था। उसके द्वारा वर्णित दूसरा अवरोध धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता थी। उसके अनुसार तीसरा अवरोध अभिमान था। यहाँ रोचक बात यह है कि इन समस्याओं की जानकारी होने पर भी अल-बिरूनी लगभग पूरी तरह से ब्राह्मणों द्वारा रचित कृतियों पर आश्रित रहा। उसने भारतीय समाज को समझने के लिए अकसर वेदों पुराणों भगवद्गीता पतंजलि की कॄतियों तथा मनुस्मृति आदि से अंश उद्धृत किए।

4-2 अल-बिरूनी का जाति व्यवस्था का विवरण

अल-बिरूनी ने अन्य समुदायों में प्रतिरूपों की खोज के माध्यम से जाति व्यवस्था को समझने और व्याख्या करने का प्रयास किया। उसने लिखा कि प्राचीन फारस में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता थी: घुड़सवार और शासक वर्ग भिक्षु आनुष्ठानिक पुरोहित तथा चिकित्सक खगोल शास्त्री तथा अन्य वैज्ञानिक और अंत में कृषक तथा शिल्पकार। दूसरे शब्दों में वह यह दिखाना चाहता था कि ये सामाजिक वर्ग केवल भारत तक ही सीमित नहीं थे। इसके साथ ही उसने यह दर्शाया कि इस्लाम में सभी लोगों को समान माना जाता था और उनमें भिन्नताएँ केवल धार्मिकता के पालन में थीं। जाति व्यवस्था के संबंध में ब्राह्मणवादी व्याख्या को मानने के बावजूद अल-बिरूनी ने अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकार किया। उसने लिखा कि हर वह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुन: प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है। सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को नहीं होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता।

उसके अनुसार जाति व्यवस्था में सन्निहित अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी। जैसाकि हमने देखा है जाति व्यवस्था के विषय में अल-बिरूनी का विवरण उसके नियामक संस्कृत ग्रंथों के अधययन से पूरी तरह से गहनता से प्रभावित था। इन ग्रंथों में ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से जाति व्यवस्था को संचालित करने वाले नियमों का प्रतिपादन किया गया था। लेकिन वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी भी कड़ी नहीं थी। उदाहरण के लिए अंत्यज ;शाब्दिक रूप में व्यवस्था से परेद्ध नामक श्रेणियों से सामान्यतया यह अपेक्षा की जाती थी कि वे किसानों और जमींदारों के लिए सस्ता श्रम उपलब्ध करें। दूसरे शब्दों में हालाँकि ये अक्सर सामाजिक प्रताड़ना का शिकार होते थे फिर भी इन्हें आर्र्थिक तंत्र में शामिल किया जाता था।

5- इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा

जब चौदहवीं शताब्दी में इब्न बतूता दिल्ली आया था उस समय तक पूरा उपमहाद्वीप एक ऐसे वैश्विक संचार तंत्र का हिस्सा बन चुका था जो पूर्व में चीन से लेकर पश्चिम में उत्तर-पश्चिमी अफ़्रीका तथा यूरोप तक फैला हुआ था। जैसाकि हमने देखा है इब्नबतूता ने स्वयं इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर यात्राएँ की पवित्र पूजास्थलों को देखा विद्वान लोगों तथा शासकों के साथ समय बिताया कई बार काजी के पद पर रहा तथा शहरी केन्द्रों की विश्ववादी संस्कृति का उपभोग किया जहाँ अरबी फारसी तुर्की तथा अन्य भाषाएँ बोलने वाले लोग विचारों सूचनाओं तथा उपाख्यानों का आदान-प्रदान करते थे। इनमें अपनी धर्मनिष्ठता के लिए प्रसिद्ध लोगों की ऐसे राजाओं जो निर्दयी तथा दयावान दोनों हो सकते थे की तथा समान्य पुरुषों और महिलाओं तथा उनके जीवन की कहानियाँ सम्मिलित थीं जो भी कुछ अपरिचित था उसे विशेष रूप से रेखांकित किया जाता था। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता था कि श्रोता अथवा पाठक सुदूर पर सुगम्य देशों के वृत्तांतों से पूरी तरह प्रभावित हो सकें।

5-1 नारियल तथा पान

इब्नबतूता की चित्रण की विजयों के कुछ बेहतरीन उदाहरण उन तरीकों में मिलते हैं जिनसे वह नारियल और पान दो ऐसी वानस्पतिक उपज जिनसे उसके पाठक पूरी तरह से अपरिचित थे का वर्णन करता है।

5-2 इब्नबतूता और भारतीय शहर

इब्नबतूता ने उपमहाद्वीप के शहरों को उन लोगों के लिए व्यापक अवसरों से भरपूर पाया जिनके पास आवश्यक इच्छा साधन तथा कौशल था। ये शहर घनी आबादी वाले तथा समृद्ध थे सिवाय कभी-कभी युद्धों तथा अभियानों से होने वाले विधवंस के। इब्नबतूता के वृत्तांत से ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकांश शहरों में भीड़-भाड़ वाली सड़कें तथा चमक-दमक वाले और रंगीन बाजार थे जो विविध प्रकार की वस्तुओं से भरे रहते थे। इब्नबतूता दिल्ली को एक बड़ा शहर विशाल आबादी वाला तथा भारत में सबसे बड़ा बताता है। दौलताबाद ;महाराष्ट्र में भी कम नहीं था और आकार में दिल्ली को चुनौती देता था। बाजार मात्र आर्थिक विनिमय के स्थान ही नहीं थे बल्कि ये सामाजिक तथा आथिक गतिविधयों के केंद्र भी थे। अधिकांश बाजारों में एक मस्जिद तथा एक मं दिर होता था और उनमें से कम से कम कुछ में तो नर्तकों संगीतकारों तथा गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए स्थान भी चिन्हित थे।

हालाँकि इब्नबतूता की शहरों की समृद्धि का वर्णन करने में अधिक रुचि नहीं थी इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत का प्रयोग यह तर्क देने में किया है कि शहर अपनी सम्पत्ति का एक बड़ा भाग गाँवों से अधिशेष के अधिग्रहण से प्राप्त करते थे। इब्नबतूता ने पाया कि भारतीय कृषि के इतना अधिक उत्पादनकारी होने का कारण मिट्टी का उपजाऊ…पन था जो किसानों के लिए वर्ष में दो फसलें उगाना संभव करता था। उसने यह भी ध्यान दिया कि उपमहाद्धीप व्यापार तथा वाणिज्य के अंतर एशियाई तंत्रों से भली-भाँति जुड़ा हुआ था। भारतीय माल की मध्य तथा दक्षिण-पूर्व एशिया दोनों में बहुत माँग थी जिससे शिल्पकारों तथा व्यापारियों को भारी मुनाफ़ा होता था। भारतीय कपड़ों विशेषरूप से सूती कपड़ा महीन मलमल रेशम जरी तथा साटन की अत्यधिक माँग थी। इब्न बतूता हमें बताता है कि महीन मलमल की कई किस्में इतनी अधिक मँहगी थीं कि उन्हें अमीर वर्ग के तथा बहुत धनाढ्‌य लोग ही पहन सकते थे।

5-3- संचार की एक अनूठी प्रणाली

व्यापारियों को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य विशेष उपाय करता था। लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय तथा विश्राम गृह स्थापित किए गए थे। इब्न बतूता डाक प्रणाली की कार्यकुशलता देखकर चकित हुआ। इससे व्यापारियों के लिए न केवल लंबी दूरी तक सूचना भेजना और उधार प्रेषित करना संभव हुआ बल्कि अल्प सूचना पर माल भेजना भी। डाक प्रणाली इतनी कुशल थी कि जहाँ ंसंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे वहीं गुप्तचरों की खबरें सुलतान तक इस डाक व्यवस्था के माध्यम से मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं।

6- बर्नियर तथा अविकसित पूर्व

जहाँ इब्न बतूता ने हर उस चीज का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया वहीं बर्नियर  एक भिन्न बुद्धिजीवी परंपरा से संबंधित था। उसने भारत में जो भी देखा वह उसकी सामान्य रूप से यूरोप और विशेष रूप से फ़्रांस में व्याप्त स्थितियों से तुलना तथा भिन्नता को उजागर करने के प्रति अधिक चिंतित था विशेष रूप से वे स्थितियाँ जिन्हें उसने अवसादकारी पाया। उसका विचार नीति-निर्माताओं तथा बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करने का था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे ऐसे निर्णय ले सकें जिन्हें वह ‘‘सही’’ मानता था। बर्नियर  के ग्रंथ टै्रवल्स इन द मुगल एम्पायर अपने गहन प्रेक्षण आलोचनात्मक अंतर्दृष्टि तथा गहन ¯चतन के लिए उल्लेखनीय है। उसके वृत्तांत में की गई

चर्चाओं में मुगलो के इतिहास को एक प्रकार के वैश्विक ढाँचे में स्थापित करने का प्रयास किया गया है। वह निरंतर मुगलकालीन भारत की तुलना तत्कालीन यूरोप से करता रहा सामान्यतया यूरोप की श्रेष्ठता को रेखांकित करते हुए। उसका भारत का चित्रण द्वि-विपरीतता के नमूने पर आधारित है जहाँ भारत को यूरोप के प्रतिलोम के रूप में दिखाया गया है या फिर यूरोप का ‘‘विपरीत’’ जैसा कि कुछ इतिहासकार परिभाषित करते हैं। उसने जो भिन्नताएँ महसूस कीं उन्हें भी पदानुक्रम के अनुसार क्रमबद्ध किया जिससे भारत पश्चिमी दुनिया को निम्न कोटि का प्रतीत हो।

6-1 भूमि स्वामित्व का प्रश्न

बर्नियर  के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नताओं में से एक भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव था। उसका निजी स्वामित्व के गुणों में दृढ़ विश्वास था और उसने भूमि पर राजकीय स्वामित्व को राज्य तथा उसके निवासियों दोनों के लिए हानिकारक माना। उसे यह लगा कि मुगल साम्राज्य में सम्राट सारी भूमि का स्वामी था जो इसे अपने अमीरों के बीच बाँटता था और इसके अर्थव्यवस्था और समाज के लिए अनर्थकारी परिणाम होते थे। इस प्रकार का अवबोधन बर्नियर  तक ही सीमित नहीं था बल्कि सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी के अधिकांश यात्रियों के वृत्तांतों में मिलता है। राजकीय भूस्वामित्व के कारण बर्नियर  तर्क देता है भूधारक अपने बच्चों को भूमि नहीं दे सकते थे। इसलिए वे उत्पादन के स्तर को बनाए रखने और उसमें बढ़ोत्तरी के लिए दूरगामी निवेश के प्रति उदासीन थे।

इस प्रकार निजी भूस्वामित्व के अभाव ने ‘‘बेहतर’’ भूधारकों के वर्ग के उदय ;जैसा कि पश्चिमी यूरोप में को रोका जो भूमि के रखरखाव व बेहतरी के प्रति सजग रहते। इसी के चलते कृषि का समान रूप से विनाश किसानों का असीम उत्पीड़न तथा समाज के सभी वर्गों के जीवन स्तर में अनवरत पतन की स्थिति उत्पन्न हुई है सिवाय शासक वर्ग के। इसी के विस्तार के रूप में बर्नियर  भारतीय समाज को दरिद्र लोगों के समरूप जनसमूह से बना वर्णित करता है जो एक बहुत अमीर तथा शक्तिशाली शासक वर्ग जो अल्पसंख्यक होते हैं के द्वारा अधिन बनाया

जाता है। गरीबों में सबसे गरीब तथा अमीरों में सबसे अमीर व्यक्ति के बीच नाममात्र को भी कोई सामाजिक समूह या वर्ग नहीं था। बर्नियर  बहुत विश्वास से कहता है भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं है। तो बर्नियर  ने मुगल साम्राज्य को इस रूप में देखा इसका राजा भिखारियों और क्रुर लोगों का राजा था इसके शहर और नगर विनष्ट तथा खराब हवा से दूषित थे और इसके खेत झाड़ीदार तथा घातक दलदल से भरे हुए थे और इसका मात्र एक ही कारण था राजकीय भूस्वामित्व। आश्चर्य की बात यह है कि एक भी सरकारी मुगल दस्तावेज यह इंगित नहीं करता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था। उदाहरण के लिए सोलहवीं शताब्दी में अकबर के काल का सरकारी इतिहासकार अबुल  फजल भूम राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताता है जो राजा द्वारा अपनी प्रजा को सुरक्षा प्रदान करने के बदले की गई माँग प्रतीत होती है न कि अपने स्वामित्व वाली भूमि पर लगान। ऐसा संभव है कि यूरोपीय यात्री ऐसी माँगों को लगान मानते थे क्योंकि भूमि राजस्व की माँग अकसर बहुत अधिक होती थी। लेकिन असल में यह न तो लगान था न ही भूमिकर बल्कि उपज पर लगने वाला कर था।

बर्नियर  के विवरणों ने अठारहवीं शताब्दी से पश्चिमी विचारकों को प्रभावित किया। उदाहरण के लिए फांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने उसके वृत्तांत का प्रयोग प्राच्य निरंकुशवाद के सिद्धांत को विकसित करने में किया जिसके अनुसार एशिया ;प्राच्य अथवा पूर्व में शासक अपनी प्रजा के ई…पर निर्बाध प्रभुत्व का उपभोग करते थे जिसे दासता और गरीबी की स्थितियों में रखा जाता था। इस तर्क का आधार यह था कि सारी भूमि पर राजा का स्वामित्व होता था तथा निजी सम्पत्ति अस्तित्व में नहीं थी। इस दृष्टिकोण के अनुसार राजा और उसके अमीर वर्ग को छोड़ प्रत्येक व्यक्ति मुश्किल से गुजर-बसर कर पाता था। उन्नीसवीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स ने इस विचार को एशियाई उत्पादन शैली के सिद्धांत के रूप में और आगे बढ़ाया।

उसने यह तर्क दिया कि भारत ;तथा अन्य एशियाई देशों में उपनिवेशवाद से पहले अधििशेष का अधििग्रहण राज्य द्वारा होता था। इससे एक ऐसे समाज का उद्भव हुआ जो बड़ी संख्या में स्वायत्त तथा ;आंतरिक रूप सेद्ध समतावादी ग्रामीण समुदायों से बना था। इन ग्रामीण समुदायों पर राजकीय दरबार का नियंत्रण होता था और जब तक अधिशेष की आपूर्ति निर्विघ्न रूप से जारी रहती थी इनकी स्वायत्तता का सम्मान किया जाता था। यह एक निष्क्रय प्रणाली मानी जाती थी। परंतु  ग्रामीण समाज का यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था। बल्कि सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में ग्रामीण समाज में चारित्रिक रूप से बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था। एक ओर बड़े जमींदार थे जो भूमि पर उच्चाधिकारों का उपभोग करते थे और दूसरी ओर अस्पृश्य भूमिविहीन श्रमिक ;बलाहार। इन दोनों के बीच में बड़ा किसान था जो किराए के श्रम का प्रयोग करता था और माल उत्पादन में संलग्न रहता था साथ ही अपेक्षाकॄत छोटे किसान भी थे जो मुश्किल से ही निर्वहन लायक उत्पादन कर पाते थे।

6-3 एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई

हालाँकि मुगल राज्य को निरंकुश रूप देने की तन्मयता स्पष्ट है लेकिन उसके विवरण कभी-कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। उदाहरण के लिए वह कहता है कि शिल्पकारों के पास अपने उत्पादों को बेहतर बनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं था क्योंकि मुनाफे का अधिग्रहण राज्य द्वारा कर लिया जाता था। इसलिए उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था। साथ ही वह यह भी मानता है कि पूरे विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुएँ भारत में आती थीं क्योंकि उत्पादों का सोने और चाँदी के बदले निर्यात होता था। वह एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय जो लंबी दूरी के विनिमय से संलग्न था के अस्तित्व को भी रेखांकित करता है। सत्रहवीं शताब्दी में जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग नगरों में रहता था। यह औसतन उसी समय पश्चिमी यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था। इतने पर भी बर्नियर मुगलकालीन शहरों को शिविर नगर कहता है जिससे उसका आशय उन नगरों से था जो अपने अस्तित्व और बने रहने के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे। उसका विश्वास था कि ये राजकीय दरबार के आगमन के साथ अस्तित्व में आते थे और इसके कहीं और चले जाने के बाद तेजी से पतनोन्मुख हो जाते थे। उसने यह भी सुझाया कि इनकी सामाजिक और आर्थिक नीव व्यवहार्य नहीं होती थी और ये राजकीय प्रश्रय पर आश्रित रहते थे।

भूस्वामित्व के प्रश्न की तरह ही बर्नियर एक अतिसरलीकृत चित्रण प्रस्तुत कर रहा था। वास्तव में सभी प्रकार के नगर अस्तित्व में थे: उत्पादन केंद्र व्यापारिक नगर बंदरगाह नगर धार्मिक केंद्र तीर्थ स्थान आदि। इनका अस्तित्व समृद्ध व्यापारिक समुदायों तथा व्यवसायिक वर्गों के अस्तित्व का सूचक है। व्यापारी अक्सर मजबूत सामुदायिक अथवा बंधुत्व के संबंधों से जुड़े होते थे और अपनी जाति तथा व्यावसायिक संस्थाओं के माध्यम से संगठित रहते थे। पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को महाजन कहा जाता था और उनके मुखिया को सेठ। अहमदाबाद जैसे शहरी केंद्रों में सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधित्व व्यापारिक समुदाय के मुखिया द्वारा होता था जिसे नगर सेठ कहा जाता था। अन्य शहरी समूहों में व्यावसायिक वर्ग जैसे चिकित्सक ;हकीम अथवा वैद्य अधयापक ;पंडित या मुल्ला अधिवक्ता ;वकील चित्रकार वास्तुविद संगीतकार सुलेखक आदि सम्मिलित थे। जहाँ कई राजकीय प्रश्रय पर आश्रित थे कई अन्य संरक्षकों या भीड़भाड़  वाले बाजार में आम लोगों की सेवा द्वारा जीवनयापन करते थे।

7- महिलाएँ : दासियाँ सती तथा श्रमिक

जिन यात्रियों ने अपने लिखित वृत्तांत छोड़े वे सामान्यतया पुरुष थे जिन्हें उपमहाद्वीप में महिलाओं की स्थिति का विषय रुचिकर और कभी-कभी जिज्ञासापूर्ण लगता था। कभी-कभी वे सामाजिक पक्षपात को सामान्य परिस्थिति मान लेते थे। उदाहरण के लिए बाजारों में दास किसी भी अन्य वस्तु की तरह खुले आम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेंटस्वरूप दिए जाते थे। जब इब्नबतूता सिंध पहुँचा तो उसने सुल्तान मुहम्मद बिन तुग्ल़क के लिए भेंटस्वरूप घोड़े ऊँट तथा दास खरीदे। जब वह मुल्तान पहुँचा तो उसने गवर्नर को किशमिश के बादाम के साथ एक दास और घोड़ा भेंट के रूप में दिए। इब्नबतूता बताता है कि मुहम्मद बिन तुग्ल़ाक नसीरुद्दीन नामक धर्मोपदेशक के प्रवचन से इतना प्रसन्न हुआ कि उसे एक लाख टके ;मुद्रा तथा दो सौ दास दे दिए।

इब्नबतूता के विवरण से प्रतीत होता है कि दासों में काफी विभेद था। सुल्तान की सेवा में कार्यरत कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं और इब्नबतूता सुल्तान की बहन की शादी के अवसर पर उनके प्रदर्शन से खूब आनंदित हुआ। सुल्तान अपने अमीरों पर नजर रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था। दासों को सामान्यत: घरेलू श्रम के लिए ही इस्तेमाल किया जाता था और इब्नबतूता ने इनकी सेवाओं को पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने में विशेष रूप से अपरिहार्य पाया। दासों की कीमत विशेष रूप से उन दासियों की जिनकी आवश्यकता घरेलू श्रम के लिए थी बहुत कम होती थी और अधिकांश परिवार जो उन्हें रख पाने में समर्थ थे कम से कम एक या दो को तो रखते ही थे।

सभी समकालीन यूरोपीय यात्रियों तथा लेखकों के लिए महिलाओं से किया जाने वाला बर्ताव अकसर पश्चिमी तथा पूर्वी समाजों के बीच भिन्नता का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता था। इसलिए यह आश्चर्यजनक बात नहीं है कि बर्नियर ने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना। उसने लिखा कि हालाँकि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था। लेकिन महिलाओं का जीवन सती प्रथा के अलावा कई और चीजों के चारों ओर घूमता था। उनका श्रम कृषि तथा कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन दोनों में महत्वपूर्ण था। व्यापारिक परिवारों से आने वाली महिलाएँ व्यापारिक गतिविधियों में हिस्सा लेती थीं यहाँ तक कि कभी-कभी वाणिज्यिक विवादों को अदालत के सामने भी ले जाती थीं। अत: यह असंभाव्य लगता है कि महिलाओं को उनके घरों के खास स्थानों तक परिसीमित कर रखा जाता था।

बाबर

 

ज़हिर उद-दिन मुहम्मद (14 फरवरी 1483 – 26 दिसम्बर 1530) जो बाबर के नाम से प्रसिद्ध हुआ, एक मुगल शासक था जिसका मूल मध्य एशिया था । वह भारत में मुगल वंश का संस्थापक था । वो तैमूर लंग का परपोता था और विश्वास रखता था कि चंगेज खां उसके वंश का पूर्वज था ।
 

आरंभिक जीवन
बाबर का जन्म फ़रगना घाटी के अंदिजन नामक शहर में हुआ था जो अब उज्बेकिस्तान में है । वो अपने पिता उमर शेख़ मिर्ज़ा, जो फरगना घाटी के शासक थे तथा जिसको उसने एक ठिगने कद के तगड़े जिस्म, मांसल चेहरे तथा गोल दाढ़ी वाले व्यक्ति के रूप में वर्णित किया है, तथा माता कुतलुग निगार खानम का ज्येष्ठ पुत्र था । हंलांकि बाबर का मूल मंगोलिया के बर्लास कबीले से सम्बन्धित था पर उस कबाले के लोगों पर फारसी तथा तुर्क जनजीवन का बहुत असर रहा था, वे इस्लाम में परिवर्तित हुए तथा उन्होने तुर्केस्तान को अपना वासस्थान बनाया । बाबर की मातृभाषा चागताई भाषा थीपर फ़ारसी, जो उस समय उस स्थान की आम बोलचाल की भाषा थी, में भी वो प्रवीण था । उसने चागताई में बाबरनामा के नाम से अपनी जीवनी लिखी ।

मंगोल जाति (जिसे फ़ारसी में मुगल कहते थे) का होने के बावजूद उसकी जनता और अनुचर तुर्क तथा फ़ारसी लोग थे । उसकी सेना में तुर्क, फारसी, पश्तो के अलावा बर्लास तथा मध्य एशियाई कबीले के लोग भी थे ।
कहा जाता है कि बाबर बहुत ही तगड़ा और शक्तिशाली था । ऐसा भी कहा जाता है कि सिर्फ व्यायाम के लिए वो दो लोगों को अपने दोनो कंधों पर लादकर उन्नयन ढाल पर दौड़ लेता था । लोककथाओं के अनुसार बाबर अपने राह में आने वाले सभी नदियों को तैर कर पार करता था । उसने गंगा को दो बार तैर कर पार किया ।
नाम
बाबर के चचेरे भाई मिर्ज़ा मुहम्मद हैदर ने लिखा है कि उस समय, जब चागताई लोग असभ्य तथा असंस्कृत थे तब उन्हे ज़हिर उद-दिन मुहम्मद का उच्चारण कठिन लगा । इस कारण उन्होंने इसका नाम बाबर रख दिया ।
सैन्य जीवन
सन् १४९४ में १२ वर्ष की आयु में ही उसे फ़रगना घाटी के शासक का पद सौंपा गया । उसके चाचाओं ने इस स्थिति का फायदा उठाया और बाबर को गद्दी से हटा दिया । कई सालों तक उसने निर्वासन में जीवन बिताया जब उसके साथ कुछ किसान और उसके सम्बंधी ही थे । १४९७ में उसने उज़्बेक शहर समरकंद पर आक्रमण किया और ७ महीनों के बाद उसे जीत भी लिया । इसी बीच, जब वह समरकंद पर आक्रमण कर रहा था तब, उसके एक सैनिक सरगना ने फ़रगना पर अपना अधिपत्य जमा लिया । जब बाबर इसपर वापस अधिकार करने फ़रगना आ रहा था तो उसकी सेना ने समरकंद में उसका साथ छोड़ दिया जिसके फलस्वरूप समरकंद और फ़रगना दोनो उसके हाथों से चले गए । सन् १५०१ में उसने समरकंद पर पुनः अधिकार कर लिया पर जल्द ही उसे उज़्बेक ख़ान मुहम्मद शायबानी ने हरा दिया और इस तरह समरकंद, जो उसके जीवन की एक बड़ी ख्वाहिश थी, उसके हाथों से फिर वापस निकल गया।
फरगना से अपने चन्द वफ़ादार सैनिकों के साथ भागने के बाद अगले तील सालों तक उसने अपनी सेना बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया । इस क्रम में उसने बड़ी मात्रा में बदख़्शान प्रांत के ताज़िकों को अपनी सेना में भर्ती किया । सन् १५०४ में हिन्दूकुश की बर्फ़ीली चोटियों को पार करके उसने काबुल पर अपना नियंत्रण स्थापित किया । नए साम्राज्य के मिलने से उसने अपनी किस्मत के सितारे खुलने के सपने देखे । कुछ दिनों के बाद उसने हेरात के एक तैमूरवंशी हुसैन बैकरह, जो कि उसका दूर का रिश्तेदार भी था, के साथ मुहम्मद शायबानी के विरुद्ध सहयोग की संधि की । पर १५०६ में हुसैन की मृत्यु के कारण ऐसा नहीं हो पाया और उसने हेरात पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया । पर दो महीनो के भीतर ही, साधनों के अभाव में उसे हेरात छोड़ना पड़ा । अपनी जीवनी में उसने हेरात को “बुद्धिजीवियों से भरे शहर” के रूप में वर्णित किया है । वहां पर उसे युईगूर कवि मीर अली शाह नवाई की रचनाओं के बारे में पता चला जो चागताई भाषा को साहित्य की भाषा बनाने के पक्ष में थे । शायद बाबर को अपनी जीवनी चागताई भाषा में लिखने की प्रेरणा उन्हीं से मिली होगी ।
काबुल लौटने के दो साल के भीतर ही एक और सरगना ने उसके ख़िलाफ़ विद्रोह किया और उसे काबुल से भागना पड़ा । जल्द ही उसने काबुल पर पुनः अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया । इधर सन् १५१० में फ़ारस के शाह इस्माईल प्रथम, जो सफ़ीवी वंश का शासक था, ने मुहम्मद शायबानी को हराकर उसकी हत्या कर डाली । इस स्थिति को देखकर बाबर ने हेरात पर पुनः नियंत्रण स्थापित किया । इसके बाद उसने शाह इस्माईल प्रथम के साथ मध्य एशिया पर मिलकर अधिपत्य जमाने के लिए एक समझौता किया । शाह इस्माईल की मदद के बदले में उमने साफ़वियों की श्रेष्ठता स्वीकार की तथा खुद एवम् अपने अनुयायियों को साफ़वियों की प्रभुता के अधीन समझा । इसके उत्तर में शाह इस्माईल ने बाबर को उसकी बहन ख़ानज़दा से मिलाया जिसे शायबानी, जिसे शाह इस्माईल ने हाल ही में हरा कर मार डाला था, ने कैद में रख़ा हुआ था और उससे विवाह करने की बलात् कोशिश कर रहा था । शाह ने बाबर को ऐश-ओ-आराम तथा सैन्य हितों के लिये पूरी सहायता दी जिसका ज़बाब बाबर ने अपने को शिया परम्परा में ढाल कर दिया । उसने शिया मुसलमानों के अनुरूप वस्त्र पहनना आरंभ किया । शाह इस्माईल के शासन काल में फ़ारस शिया मुसलमानों का गढ़ बन गया और वो अपने आप को सातवें शिया इमाम मूसा अल क़ाज़िम का वंशज मानता था । वहां सिक्के शाह के नाम में ढलते थे तथा मस्ज़िद में खुतबे शाह के नाम से पढ़े जाते थे हंलांकि क़ाबुल में सिक्के और खुतबे बाबर के नाम से ही थे । बाबर समरकंद का शासन शाह इस्माईल के सहयोगी की हैसियत से चलाता था ।
शाह की मदद से बाबर ने बुखारा पर चढ़ाई की । वहां पर बाबर, एक तैमूरवंशी होने के कारण, लोगों की नजर में उज़्बेकों से मुक्तिदाता के रूप में देखा गया और गांव के गांव उसको बधाई देने के लिए खाली हो गए । इसके बाद फारस के शाह की मदद को अनावश्यक समझकर उसने शाह की सहायता लेनी बंद कर दी । अक्टूबर १५११ में उसने समरकंद पर चढ़ाई की और एक बार फिर उसे अपने अधीन कर लिया । वहां भी उसका स्वागत हुआ और एक बार फिर गांव के गांव उसको बधाई देने के लिए खाली हो गए । वहां सुन्नी मुलसमानों के बीच वह शिया वस्त्रों में एकदम अलग लग रहा था । हंलांकि उसका शिया हुलिया सिर्फ शाह इस्माईल के प्रति साम्यता को दर्शाने के लिए थी, उसने अपना शिया स्वरूप बनाए रखा । यद्यपि उसने फारस के शाह को खुश करने हेतु सुन्नियों का नरसंहार नहीं किया पर उसने शिया के प्रति आस्था भी नहीं छोड़ी जिसके कारण जनता में उसके प्रति भारी अनास्था की भावना फैल गई । इसके फलस्वरूप, ८ महीनों के बाद, उज्बेकों ने समरकंद पर फिर से अधिकार कर लिया ।
 उत्तर भारत पर चढ़ाई
दिल्ली सल्तनत पर ख़िलज़ी राजवंश के पतन के बाद अराजकता की स्थिति बनी हुई थी । तैमूरलंग के आक्रमण के बाद सैय्यदों ने स्थिति का फ़ायदा उठाकर दिल्ली की सत्ता पर अधिपत्य कायम कर लिया । तैमुर लंग के द्वारा पंजाब का शासक बनाए जाने के बाद खिज्र खान ने इस वंश की स्थापना की थी । बाद में लोदी राजवंश के अफ़ग़ानों ने सैय्यदों को हरा कर सत्ता हथिया ली थी ।
 

इब्राहिम लोदी
बाबर को लगता था कि दिल्ली सल्तनत पर फिर से तैमूरवंशियों का शासन होना चाहिए । एक तैमूरवंशी होने के कारण वो दिल्ली सल्तनत पर कब्जा करना चाहता था । उसने सुल्तान इब्राहिम लोदी को अपनी इच्छा से अवगत कराया  । इब्राहिम लोदी के जबाब नहीं आने पर उसने छोटे-छोटे आक्रमण करने आरंभ कर दिये । सबसे पहले उसने कंधार पर कब्जा किया । इधर शाह इस्माईल को तुर्कों के हाथों भारी हार का सामना करना पड़ा । इस युद्ध के बार शाह इस्माईल तथा बाबर, दोनों ने बारूदी हथियारों की सैन्य महत्ता समझते हुए इसका उपयोग अपनी सेना में आरंभ किया । इसके बाद उसने इब्राहिम लोदी पर आक्रमण किया । पानीपत में लड़ी गई इस लड़ाई को पानीपत का प्रथम युद्ध के नाम से जानते हैं । इसमें बाबर की सेना इब्राहिम लोदी की सेना के सामने बहुत छोटी थी । पर सेमा में संगठन के अभाव में इब्राहिम लोदी यह युद्ध बाबर से हार गया । इसके बाद दिल्ली की सत्ता पर बाबर का अधिकार हो गया और उसने सन १५२६ में मुगलवंश की नींव डाली ।
राजपूत
राणा सांगा के नेतृत्व में राजपूत काफी संगठित तथा शक्तिशाली हो चुके थे । राजपूतों ने एक बड़ा सा क्षेत्र स्वतंत्र कर लिया था और वे दिल्ली की सत्ता पर काबिज होना चाहते थे । इब्राहिम लोदी से लड़ते लड़ते बाबर की सेना को बहुत क्षति पहुंची थी । बाबर की सेना राजपूतों की आधी भी नहीं थी । मार्च १५२७ में खानवा की लड़ाई राजपूतों तथा बाबर की सेना के बीच लड़ी गई । राजपूतों का जीतना निश्चित लग रहा था । पर युद्ध के दौरान तोमरों ने राणा सांगा का साथ छोड़ दिया और बाबर से जा मिले । इसके बाद राणा सांगा को भागना पड़ा और एक आसान सी लग रही जीत उसके हाथों से निकल गई । इसके एक साल के बाद किसी मंत्री द्वारा जहर खिलाने कारण राणा सांगा की मौत हो गई और बाबर का सबसे बड़ा डर उसके माथे से टल गया । इसके बाद बाबर दिल्ली की गद्दी का अविवादित अधिकारी बन गया । आने वाले दिनों में मुगल वंश ने भारत की सत्ता पर ३०० सालों तक राज किया ।

बाबर के द्वारा मुगलवंश की नींव रखने के बाद मुगलों ने भारत की संस्कृति पर अपना अमिट छाप छोड़ी ।
अन्तिम के दिन
कहा जाता है कि अपने पुत्र हुमायुं के बीमार पड़ने पर उसने अल्लाह से हुमायुं को स्वस्थ्य करने तथा उसकी बीमारी खुद को दिये जाने की प्रार्थना की थी । इसके बाद बाबर का स्वास्थ्य बिगड़ गया और अंततः वो १५३० में ४८ वर्ष की उम्र में मर गया । उसकी ईच्छा थी कि उसे काबुल में दफ़नाया जाए पर पहले उसे आगरा में दफ़नाया गया । लगभग नौ वर्षों के बाद शेरशाह सूरी ने उसकी इच्छा पूरी की और उसे काबुल में दफ़ना दिया ।
 
हुमायूँ
हुमायूँ एक मुगल शासक था । प्रथम मुग़ल सम्राट बाबर के पुत्र नसीरुद्दीन हुमायुं (6 मार्च 1508 – 22 फरवरी, 1556) थे। यद्यपि उन के पास साम्राज्य बहुत साल तक नही रहा, पर मुग़ल साम्राज्य की नींव में हुमायुं का योगदान है।
बाबर की मृत्यु के पश्चात हुमायूँ ने १५३० में भारत की राजगद्दी संभाली और उनके सौतेले भाई कामरान मिर्ज़ा ने काबुल और लाहौर का शासन ले लिया। बाबर ने मरने से पहले ही इस तरह से राज्य को बाँटा ताकि आगे चल कर दोनों भाइयों में लड़ाई न हो। कामरान आगे जाकर हुमायूँ के कड़े प्रतिद्वंदी बने। हुमायूँ का शासन अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत के हिस्सों पर 1530-1540, और फिर 1555-1556 तक रहा।
भारत में उन्होने शेरशाह सूरी से हार पायी। 10 साल बाद, ईरान साम्राज्य की मदद से वे अपना शासन दोबारा पा सके। इस के साथ ही, मुग़ल दरबार की संस्कृति भी मध्य एशियन से इरानी होती चली गयी।
हुमायुं के बेटे का नाम जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर था।
 

 

अकबर
जन्म
बाबर की मृत्यु के दस साल के भीतर ही (सन्‌ १५३०) उनके पुत्र हुमायूँ के हाथ से गद्दी निकल गई । वह जान बचाने के लिये इधर-उधर मारा मारा फिर रहा था। इसी बीच सन्‌ १५४१ में हमीदा बानो से हुमायूँ की शादी हुई और सन्‌ १५४२ में अकबर का जन्म हुआ। अकबर के माँ-बाप अपनी जान बचाने इरान भाग गये और अकबर अपने पिता के छोटे भाइयों के संरक्षण में रहा। पहले वह कुछ दिनों कंदहार में रहा और १५४५ से काबुल में। हुमायूँ की अपने छोटे भाइयों से बराबर ठनी ही रही इसलिये चाचा लोगों के यहाँ अकबर कि स्थिति बंदी से कुछ ही अच्छी थी। यद्यपि सभी उसके साथ अच्छा व्यवहार करते थे और शायद दुलार प्यार कुछ ज्यादा ही होता था।
 

आरंभिक काल

सन्‌ १५४५ में जब हुमायूँ ने फिर से काबुल पर अधिकार कर लिया तो अकबर अपने पिता के संरक्षण में पहुंचा। लेकिन १५४५-१५४६ की छोटी-सी अवधि में अकबर के चाचा कमरान ने काबुल पर पुनः अधिकार कर लिया था। मगर अकबर अपने माता-पिता के संरक्षण में ही रहा। उन्होंने अपने पुत्र को अच्छी से अच्छी शिक्षा देने की चेष्टा की किंतु उससे विमुख ही रहा, परंपरागत पढ़ाई में उसकी बिलकुल रूची नहीं थी। परवर्ती काल में अकबर ने अपने आप को निरक्षर बताया है किंतु इस आत्मस्वीकृति में सत्यांश बस इतना है कि उसने स्वयं कभी कुछ नहीं लिखा । अपने परवर्ती जीवन में अकबर को पुस्तकों से बड़ा मोह हो गया और वह दूसरों से पढ़वाकर उन्हें सुना करता था।
अपने खोये हुए राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिये हुमायूँ के अनवरत प्रयत्न अंततः सफल हुये और वह सन्‌ १५५५ में हिंदुस्तान पहुंच सका किंतु सन्‌ १५५६ में राजधानी दिल्ली में उसकी मृत्यु हो गई। गुरदासपुर के कलनौर नामक स्थान पर जब अकबर की ताजपोशी हुई उस समय उसकी उम्र मात्र चौदह वर्ष थी। उस समय मुगल राज्य केवल काबुल से दिल्ली तक ही फैला हुआ था। और हेमु के नेतृत्व में अफगान सेना पुनः संगठित होकर उसके सम्मुख चुनौती बनकर खड़ी थी।
 

शासन

राज्य की सुरक्षा का दायित्व बालक अकबर के संरक्षक बैरम खां के कंधों पर था। प्रारंभ के चार वर्षों तक बैरम खां ने ही शासन संभाला। किंतु सन्‌ १५६० में अकबर ने स्वयं सत्ता संभाल ली और बैरम खां को निकाल बाहर किया। अब अकबर के स्वयं के हाथों में सत्ता थी – यद्यपि इस तथ्य को समझने में कुछेक लोगों को काफी समय लगा। उस समय अनेक गंभीर कठनाइयाँ आईं जैसे – शम्सुद्दीन अतका खां की हत्या पर उभरा जन आक्रोश (१५६३), उज़बेक विद्रोह (१५६४-६५) और मिर्ज़ा भाइयों का विद्रोह (१५६६-६७) किंतु अकबर ने बड़ी कुशलता से इन समस्याओं को हल कर लिया। अपनी कल्पनाशीलता से उसने अपने सामंतों की संख्या बढ़ाई। सन्‌ १५६२ में आमेर के शासक से उसने समझौता किया – इस प्रकार राजपूत राजा भी उसकी ओर हो गये। इसी प्रकार उसने इरान से आने वालों को भी बड़ी सहयाता दी। भारतीय मुसलमानों को भी उसने अपने कुशल व्यवहार से अपनी ओर कर लिया। धार्मिक सहिष्णुता का उसने अनोखा परिचय दिया – हिंदु तीर्थ स्थानों पर लगा कर हटा लिया गया (सन्‌ १५६३)। इससे पूरे राज्यवासियों को अनुभव हो गया कि वह एक परिवर्तित नीति अपनाने में सक्षम है।
 
 

जहांगीर

जहांगीर मुगल सम्राट था और वह अकबर के पुत्र थे। इनका बचपन का नाम सलीम था।
 
 

शाहजहां

शाहजहां मुगल सम्राट। शाहजहाँ अपनी न्यायप्रियता और वैभवविलास के कारण अपने काल में बड़े लोकप्रिय रहे। किन्तु इतिहास में उनका नाम केवल इस कारण नहीं लिया जाता। शाहजहाँ का नाम एक ऐसे आशिक के तौर पर लिया जाता है जिसने अपनी बेग़म मुमताज़ महल के लिये विश्व की सबसे ख़ूबसूरत इमारत ताज महल बनाने का यत्न किया।
 
 औरंगजेब
 
बहादुरशाह ज़फ़र
अबू ज़फ़र सिराजुद्दीन मुहम्मद बहादुरशाह ज़फ़र (उर्दू: ابو ظفر سِراجُ الْدین محمد بُہادر شاہ ظفر) या बहादुरशाह द्वितीय, जिसका ज़फ़र उपनाम था, भारत में मुगलों का अंतिम सम्राट था। उसका जन्म 24 अक्तूबर 1775 में हुआ था और वह अकबर शाह द्वितीय का हिंदू पत्नी लालबाई से उत्पन्न पुत्र था। वह 28 सितंबर 1838 को अपने पिता की मृत्यु के बाद सिंहासन पर बैठा।

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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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